आरम्भ

आरम्भ नया  करना होगा !

शुभ लग्न ,घड़ी या पल का क्या

ये  कर्मठता की चेरी हैं ,

सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं

निश्चय करने की देरी है ,

शुभ कर्म, पुण्य कर्तव्य ठान

कर समाधान हर आगत का ,

देता  अलभ्य को  जो विराम 

है  वही  पात्र हर स्वागत का ,

पत्थर का सीना तोड़ वीर

रसपान करो तुम विजय नीर

टूट  पड़ो   कर   सिंहनाद

सत्य   यही   है  निर्विवाद ,

जीवन रण में बन वज्र चरण

कर पाओगे तुम विजय वरण |

कर्मयोग को अपना कर

सन्दर्भ नया रचना होगा

आरम्भ नया करना होगा !

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7 टिप्पणियाँ “आरम्भ” पर

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