फिर एक बार

समय के सुनहले आकाश में

उमंगों की रंग बिरंगी पतंगें

हालात  की हवाओं के सहारे

कभी गोते लगाती तो कभी

नई ऊँचाईयों को छूने लगती हैं ,

आशाओं की डोर थामे

क्षितिज के छोर की तलाश में

उम्मीद भरी नज़रें 

आकांक्षाओं के विस्तार में

कहीं खोने लगती हैं ,

कथानक है वही

पटकथा वही पुरानी सी है

पात्र आते नित नए

नियति बदलते रहती है ,

धरा की धूल में लिपटी

अनगिन चापों की आकृतियाँ,

अनंत ,अखंड ,सर्व व्याप्त

गुंजायमान  भटकते स्वरों से

जुड़ने का प्रयास करने लगती  हैं ,

आओ इस विस्तार में तलाशें

आसमान का एक टुकड़ा

जहाँ लहराएँ ,गोते लगाएं

इंद्रधनुषी चाहतों की पतंगों पर सवार

बार-बार ,बारंबार ………………

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