दधीचि

संवेदना सिहर उठी ,

दृश्यता अभिशाप बन गई 

विधाता ने दृष्टि डाली ,

अंतर के दीप जल गए

आत्म संबल जाग उठा ,

साधना समर्थ बन गई

बाधिता के बंध सारे ,

रक्षा के सूत्र बन गए

मनस्वी की चेतना ,

सत्य का सोपान बन गई

शून्य से तब सृजन की

संकल्पना के सेतु बन गए

नमन उस दधीचि को ,

कीर्ति जिसकी अमर बन गई

ब्रेल की सौगात दे कर ,

बाध्यता को मात दे गए !

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