काल के कपाल पर

कुछ दिनों तक तेज बह कर

वेग हर थम जायेगा ,

कुछ क्षणों तक भटक कर

 मन ठौर पर आ जायेगा |

भाग कर सच्चाइयों से

कहाँ तक तुम जाओगे !

सवालों की बारिशों से

कैसे तुम बच पाओगे !

पार जाना हो यदि ,

तो धार में रखो कदम ,

नाव के चक्कर में तो

यूँ ही खड़े रह जाओगे |

छटपटाहट डूबने की ,

मन को भेद जायेगी ,

सामर्थ्य की महत्ता से

मिलन  करवाएगी |

भंवर को डुबो के तुम

बाहर निकल जब आओगे ,

काल के कपाल पर तुम

कुछ नया लिख जाओगे !

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3 टिप्पणियाँ “काल के कपाल पर” पर

  1. उमंग और उत्साह से भरपूर प्रेरणादायक कविता है आपकी सबसे अच्छी बात है कि आपकी कविताओं में किसी दूसरी भाषा की घुषपैठ प्रायः न के बराबर होती है हिंदी तथा उर्दू पर आपका समान अधिकार है

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