कुछ शेष प्रश्न

क्षितिज पर पसरा उजाला

चाँद  ने  भी  ली  विदा  है ,

बंद सीप ,बूंद अमृत

क्या पता ,अब क्या बदा है !

काल में गर्भस्थ पल ये  

सृजन की संभावना हैं ,

कर्म पथ में नित समर्पित

लक्ष्य की आराधना हैं |

शेष हैं कुछ प्रश्न अगम

गम्यता की भावना हैं ,

अमर्त्यता जिसमें समाहित

अपूर्ण  परिकल्पना हैं |

छोड़ दो अब स्वप्न शैय्या ,

शर की सेज को सजा लो |

झोंक दो तुम अस्मिता को

विजय के तुम गीत गा लो !

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6 टिप्पणियाँ “कुछ शेष प्रश्न” पर

    • मेरा सौभाग्य है कि आप जैसी बहुआयामी प्रतिभा मेरी रचनाओं का मूल्यांकन करते रहती हैं |आपका हार्दिक धन्यवाद एवं नूतन वर्ष में आपकी रचनात्मकता उदात्ता के नए प्रतिमान स्थापित करे ,इसी मंगल कामना के संग सादर

  1. छोड़ दो अब स्वप्न शैय्या ,

    शर की सेज को सजा लो |

    झोंक दो तुम अस्मिता को

    विजय के तुम गीत गा लो !

    ….बहुत सुन्दर और ओजमयी प्रस्तुति…

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