मित्रता

मित्रता  अतुल्य  है,  बहुमूल्य  है   ये  भावना ,

 अहम का है  समर्पण ,  संबंध की  ये साधना |

सुखद कोमल भावनाओं का समागम मित्रता ,

प्राण  इस संबंध  का है  वचन की प्रतिबद्धता |

आस्था हो मित्र पर सद् हृदय से व्यवहार हो ,

सदा कुसुमित रहे कानन बस यही उदगार हो |

सुभेक्षा ,संदर्भ रहित , स्नेह  का उपहार  हो ,

मित्रता में  सदा निज स्वार्थ का प्रतिकार हो | 

मन का सामंजस्य  है  ये , देव का  वरदान है ,

नमन है उसको जो रखता मित्रता का मान है || 

 

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5 टिप्पणियाँ “मित्रता” पर

    • देवेन्द्र जी आपकी टिप्पणियोँ के लिए हार्दिक धन्यवाद | मित्रता के सन्दर्भ में दो पंक्तियाँ (दिनकर जी की) मुझे सदैव स्पंदित करती रहीं ;
      मैत्री की बड़ी सुखद छाया ,शीतल हो जाती है काया
      मित्रता बड़ा अनमोल रतन ,कब इसे तोल सकता है धन

      आशा करता हूँ आप इसी तरह स्नेहदृष्टि बनाये रखेगें |

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