बेसुरे सुर

सुर सभी अब  बेसुरे लगने लगे हैं

स्वप्न सुंदर देखते थे कभी जो

वक्त की बादल में अब छुपने लगे हैं |

था जमाना गैर भी लगते थे अपने

सोचता था मंजिलों तक साथ देगें ,

समय की कुछ मार ऐसी पड़ी कि

साथ के साये भी अब कटने लगे हैं |

वक्त चाहे कर ले कितनी भी सियासत

चाहे पथ पर अनगिनत कांटे बिछा दे ,

बैठेगें न हाथ पर धर हाथ रख हम

हम कहाँ अभी थकने लगे हैं !

क्या यकीं उनका जो सुर रोज बदलें ,

सफर पर हम चल पड़े हैं अकेले ,

पूछते हैं लोग हमसे ही पता अब

कई अब तो साथ जुड़ने लगे हैं ,

चलो मिल कर सुरों को फिर से सजायें

बुझ गए दीपों को हम फिर से जलाएं

वो निगाहें थक गयीं जो राह तक कर

सुनहले सपनों को हम उनमें बसायें |

आबरू हर जिंदगी की लुट रही है ,

रो रही इंसानियत को अब हँसाएं,

बेसुरे से सब सुरों को अब संवारें ,

हरेक पल को सुरीले स्वर में गाएँ  |

वक्त की बाजीगरी को देख कर के

बेसुरे भी सुर में अब बजने लगे हैं ,

सुर सभी अब सही से लगने लगे हैं ||

 

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4 टिप्पणियाँ “बेसुरे सुर” पर

  1. सुरों की मिठास को सुनना तो एक बात है लेकिन आपकी इस कविता ने सुरों को एक नया आयाम दिया है जिसे महसूस किया जा सकता है. ऐसी कविता के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

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