अभिशप्त प्रश्न

 

प्राणित अपूर्ण थी यह काया ,मातृत्व प्रभूत शीतल छाया

तुम्ही बताओ जनक मेरे क्यों तुमने मुझको त्याग दिया !

जननी ने ही एक जननी को ये कैसा है अभिशाप दिया ?

थी कली अभी इक खिलने को प्रस्फुटित सुपुष्पित  होने को

कुछ नए सुरों को सजना था कुछ मधुर धुनों को बजना था

सुरभित होना था अभी मलय पल्लवित था होना नव किसलय

अभी  नहीं खुले थे मेरे नयन, सबने मिल दर्पण तोड़ दिया ,

हे देव ! ये कैसा भाग्य मेरा मुझे जन्म से पहले छोड़ दिया |

मैं मातृशक्ति की प्रतिछाया नहीं पूर्ण हो सकी थी काया ,

अयन अपूरित नयन बंद जठरागृह में आबद्ध बंध ,

बिटिया बन मुझको आना था जननी का धर्म निभाना था ,

पर कौन सुनेगा मेरी व्यथा कलयुग की अब तो यही कथा ,

मातृत्व प्रताड़ित होती है ममता छुप छुप के रोती है ,

पितृत्व पिशाच बन जाएगा बिटिया को कौन बचाएगा ?????

गर धरा नहीं बच पायेगी तो फसल कहाँ से आएगी ?

सोचो कैसा वो प्रहर  होगा जब मातृविहीन ये घर होगा !

लज्जा, धीरज, ममता, संयम, स्नेह, त्याग, निस्वार्थ समर्पण,

ठौर कहाँ पर पायेगें क्या हमें छोड़ न जायेगें ?

मत करो कलंकित नरता को मत रोने दो अब ममता को

माता की क्या पूजा होगी जब बेटी की हत्या होगी !

आओ मिल कर गाएं वंदन  हर पुत्री का करें अभिनन्दन

अभिशप्त समाज बच जायेगा अमरत्व का वर पा जायेगा ………..

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6 टिप्पणियाँ “अभिशप्त प्रश्न” पर

  1. jaisee umeed theee usase badha kar rachana hai .Bahut utkrishta rachna.Samaajik pariwartan ke liye ek kawee kee utkat abhilasha spashta dristigochar ho rahi hai .Aao mil kar gaae wandan har putri ka kare abhindan –yahi saar roopi garahana karta hoon.
    punah eisee rachanake liye dhanyawad

    • इस रचना की ओर प्रेरित करने के लिए मैं आपका आभारी हूँ |संवेदना की अभिव्यक्ति के लिए शब्दों का चयन करने में रचनाकार कभी कभी बहुत ही असहाय अनुभव करने लगता है | वह इस परिस्थिति से उबर कर यदि विषय वस्तु को पाठक के समक्ष उपस्थापित करने में आंशिक रूप से भी सफल हो जाये तो एक संतुष्टि का अनुभव करता है |
      आपसे सविनय आग्रह है कि अपने भावनात्मक व्यक्तित्व की स्नेह छाया में यदा कदा शरणागत होने का अवसर उपलब्ध कराते रहें |
      कोटि कोटि धन्यवाद

  2. समाज का ज्वलंत प्रश्न बहुत मार्मिक ढंग से उठाया है …अगर समाज नहीं चेतेगा तो परिणाम बहुत भयंकर ही होंगे| कभी मैंने भी इस यक्ष प्रश्न पर एक मार्मिक गीत लिखा था …मेरे ब्लॉग में है कभी समय मिले तो पढियेगा …कुछा पंक्तियाँ यहाँ दे रही हूँ ….
    संतुलन बिगड़ रहा बेटी को खोने से /ज़ुल्म और भी बढ़ेगे बेटी के नहीं होने से
    सृष्टि के संतुलन को कुछ तो संभालिए / अजन्मी भ्रूणी बेटी को यूं न मिटाइए
    करता है अंग -भंग जब चाकू से डाक्टर /डर- डर के चीखती है माँ-माँ पुकार कर
    करती है आर्त्तनाद पापा बचाइए / अजन्मी भ्रूणी बेटी को यूं न मिटाइए
    सार्थक कविता के लिए बधाई व शुभकामनाएं

    • आपका आभारी हूँ कि आपने अमूल्य समय दे कर रचना को पढ़ा और अपने विचारों से अवगत कराया | आपकी रचना की दो पंक्तिओं ने ही उसकी उत्कृष्टता की झलक दे दी | जरुर पढूंगा | आपका सादर धन्यवाद

  3. दिव्यांश जी , महापंडित राहुल संकृत्यायन का भोजपूरी में लिखा एक नाटक है मेहरारुन की दुर्दशा उसका एक अंश है
    एके माई बापवा के एक ही उदारवा से
    दोनों के जनामावा भईलरे पुरूषवा
    बेटा के जन्म पर नाच और मान होला
    बेटी के जन्म पर शोक रे पुरूषवा
    एक फिल्म है मातृभूमि – अ नेसन विदाऔट वुमेन जिसके डिरेक्टर हैं मनीष झा आप से अनुरोध है कि आप उसे अवश्य देखे आपकी रचना इसी कड़ी में एक और सराहनीय प्रयास है

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