कई रंग

बहार आई और  झूम कर छाई भी अबके

इक फूल न खिल सका मेरे आशियाने में

यूँ  तो  देखे  हैं  कई रंग जमाने  के  हमने

पर  झांक न सके कभी अपने तहखाने में

जल जाना ही अंजाम है  इन परवानो का

मज़ा आता है क्या उन्हें , इन्हें जलाने में

मिलाया हाथ सबसे ,आगे बढ़ गले भी लगे

मिला हमें न  कोई  हमनफस  जमाने में

ऐतबार  यूँ  ही  नहीं किया करते हैं सबपे

तमाम  उम्र  बीत  जाती है आजमाने में

दबी जुबां  में  ये अंदाज़े गुफ्तगूं क्या है

मज़ा  तो  है  खुल  के  सुनने सुनाने में

झुकी नज़रें कयामत का असर रखतीं हैं

इक अरसा बीत गया ये उन्हें समझाने में

ग़मों का मजमा लगा है हर इक चौराहे पे

वो यकीं रखते हैं बच के निकल जाने में

ये और बात है हम इश्क फरमा न सके दिव्यांश

कसर कोई भी न थी तेरे अफसाने में

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2 टिप्पणियाँ “कई रंग” पर

  1. ऐतबार यूँ ही नहीं किया करते हैं सबपे
    तमाम उम्र बीत जाती है आजमाने में

    एकदम सच बात … उम्र बीत जाती है .. काबिल-ए-ऐतबार लोगों की पहचान करने में

    सादर

    मंजु

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