मन को क्यों

मन को क्यों हर पल समझाते !

मन तो सच्ची बात है कहता

यूँ ही तुम इसको बहलाते,

इधर उधर की बातें कर के

तुम हरदम इसको भटकाते |

झूठ ,दिखावा ,लोभ,मोह ,मद,

इर्ष्या ,द्वेष का फंद  बनाते ,

बेचारे मन के पंछी को

जब तब इसमें तुम उलझाते |

मन मौजी की क्या गलती है ,

मन की मर्जी कब चलती है ?

कभी डराते कभी धमकाते ,

प्यार दिखा कर कभी भरमाते ,

नहीं मानता इस पर भी तब

तज देने का भय दिखलाते |

मन तो है निर्दोष,निष्कपट

कभी तुम्हारा बुरा न चाहे ,

जब भी तुम ठोकर खा गिरते

फैला देता अपनी बांहें |

यदि चाहते तुम अपने को

सुना करो तुम अपने मन को ,

क्यों हो इसको तुम ठुकराते 

मन को क्यों ………………….

Advertisements

6 टिप्पणियाँ “मन को क्यों” पर

    • आपने रचना को इस योग्य समझा इसके लिए मैं आपका हार्दिक धन्यवाद करता हूँ |
      कृपया भविष्य में भी अपने महत्वपूर्ण मंतव्यों से अवगत कराते रहें |

      सादर

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s