बदलते संदर्भ

अरे ! ये तो वही पत्ता है जो कल तक

 उस हरे भरे वृक्ष की एक शाख की पहचान था |

कितना खिला सा था,झूमता था मदमस्त ,पवन के झोकों पर

मुस्कुरा कर लेता था चूम ,पानी की  नन्हीं बूंदों को

फैला देता था अपने दामन को ,समेट लेने को, सूरज की ऊष्मा |

 

आज देखा है उसे मैंने ज़मीन पर पड़े ,औंधे मुँह |

पीला पड़ता जा रहा था ,

शायद शाख से बिछुड़ने का गम था उसे |

सूखा सा लग रहा था, निराशा साफ़ झलक रही थी

उसके निस्तेज चेहरे से |

 

कभी पवन के झोकों पर झूमने वाला ,

आज उसके थपेडों पर लड़खड़ा रहा था ,

असफल प्रयास करता हुआ अपने आप को स्थायित्व से जोड़ने का |

कभी सूरज की रोशनी पर चमक उठने वाला

आज उसी रोशनी में अपनी अस्मिता को खोता चला जा रहा था |

 

संदर्भों के मायने क्या बदलते रहते हैं इसी तरह ?           

शायद हां,टूटना होता है हरेक पत्ते को

किसी किसी शाख से ,

सिंहावलोकन  करता है तब अपने अतीत की विस्मृतियों का |

अपनत्व का दंश सहना पड़ता है उसे  ,

सब नीलकंठ तो नहीं बन पाते !

 

चेतना की स्तरों से विलग ,आर्तनाद उसका

अँधेरी कालकोठरी की दीवारों से टकरा कर क्षतविक्षत होती जाती हैं |

कहीं दूर आशा की  मरुभूमि में पड़ा महसूस करना चाहता है

थाली की  पानी में थिरकती चाँदनी की शीतलता को |

इसी मृगमरीचिका में उलझा ,

अहसास के अंधेरे दायरों में

गुम होता चला जाता है ,

 किसी अनजान प्रकाश पुंज के सम्मोहन में |

 

और फिर शुरू होती है एक नयी यात्रा ,

एक नए पड़ाव की  तलाश में ,

एक बदले  हुए परिवेश में |

जहाँ समय की  वैशाखियाँ नहीं होतीं ,

ईच्छाओं  के साये नहीं होते ,

अभिशप्त संवेदनाएँ नहीं होतीं ,

होता है सब कुछ संपूर्ण |

सार्थक कर देता है हर इक धड़कन का धड़कना |

हर पल को रहता है इंतज़ार किसी आती पल के चाप का,

इंतज़ार एक नए संदर्भ का, जो आता है नए मायनो के साथ

और घुम जाता है परिवर्तन का चक्र

फिर एक बार ………….

 

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2 टिप्पणियाँ “बदलते संदर्भ” पर

  1. IS patte ki dasta ne yad diyai muze 1 kahani..
    jise dekh kar mene sansar ki aasarta ko pahchani…
    prasang tha khushiyo ka, charo aur umang tha..
    BETE ki shaddi ke utsav me pariwar sara prasanna tha…
    shaddi ki tyari me sara ghar duba tha..
    aanand aur ullaas me har koi jhuma tha….
    sahra bandhe dulheraja barat le ja rahe..
    sukh ke in palo me ve phule na sama rahe…
    gauduli bela me le rahe dulhan sang sat vachan…
    7 janmo tak sath rahne ka de diya dulhan ko aashvasan……..
    …………………….
    dusre din ke prabhat me hui 1 aanhoni….dulhe raja ko aaya heartatteck…jisne pariwar ki sari khushiya chini…
    Ye to vahi Dulha he jo kal mandap me dikha tha..
    aur aaj maut se bebas ho aag ki lapto ke hawale…..

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