अवसाद और सृजन

दुःख या अवसाद का क्षण मनुष्य का निजी और व्यक्तिगत होता है |

सुख  का  परिवेश  या  उल्लास का वातावरण तो सम्पूर्ण समष्टि के

उत्साहपूर्ण सहभागिता  का  साक्षी होता  है  परन्तु  अवसादपूरित 

वेदनायुक्त  परिस्थितिओं  में  मनुष्य  अपने  अंदर  छिपे  संबल  को

तलाशता है | उसका  अगर  कोई  सहभोक्ता होता है तो वह  उसी का

अतीत होता है | अवसाद के क्षणों को  सृजनात्मकता  के  सांचे  में

ढालना , समाज  की  निरंतरता  के  प्रति  एक  समन्वित , प्रतिबद्ध

प्रयास  होगा |  स्रष्टा   की  परिकल्पनाओं  के  प्रति  सादर  भाव  से

समर्पण  ही  अवसादग्रस्त  क्षणों  को क्रियात्मकता से परिपूर्ण  और

सजीव बना सकते हैं |

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