बचपन दर्शन

नन्हा  सा  एक  देवदूत  है जब  से मेरे  आँगन  आया

भुला चुका था जिस बचपन को फिर से मुझको याद है आया

बिलख बिलख के रोता बचपन हँस उठता कभी किलक किलक के

जननी के आंचल की छाया पड़ती जब भी शिशु के मुख पे

बड़े स्नेह से गोद में लेकर  पुलकित पिता सुअंक लगा कर

नन्हे  शिशु  को  गले  लगाते  क्षण  भर की समयावधी में

जीवन भर की खुशियाँ पाते  एक विजयी मुस्कान लिए वह

डगमग करता चलता आता  लकड़ी की पहियों की काठी

मुझको  मेरी  याद  दिलाता  गिरता  पड़ता  दौड़ा  करता

क्षण में हँसता क्षण में रोता  डर का कोई भान नहीं था

समय का कोई ज्ञान नहीं था खालीपन का पता न होता

नींद चैन की हरदम सोता  तितली के संग दौड़ लगाता

चिड़ियों के संग गाना गाता कान पकड़ छोटे कुत्ते का

खींचा करता और उठाता  समझ बढ़ी और दोस्त बन गए

एक नई दुनिया में रम गए सुबह सबेरे भागा करते

खेलों में नित डूबे रहते सृजन विसर्जन नई कल्पना

कभी रूठना कभी मनाना  संबंधों से परिचय करता

एक नया आयाम था पाया यही है जीवन  यही  है माया

बचपन की दुनिया है अद्भुत दर्शन इसका समझ न पाया

 

 

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