अकेलापन

एकाकी होने में और एकाकीपन को जीने में बहुत फर्क है |

जहाँ एकाकी होना अपने आप में संपूर्णता को परिभाषित

करता है वहीं एकाकीपन ऋणात्मक परिवेश का निर्माण

करता है|  अकेलेपन को जीना वैयक्तिकता की वेदना से

साक्षात्कार करना सा है |वेदना-पूरित आस्थाओं की टीस

एकाकीपन को जीने में हर क्षण चुभती रहती है | जहाँ

अकेलापन सृजनात्मकता के ताने बाने को बुनता नए

संदर्भों का निर्माण करता है वहीं अकेलेपन को जीता आदमी

अपनी ही वैयक्तिकता की प्रतिमा को खंडित करने लगता है |

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