अपनत्व

अपनत्व या आत्मीयता प्रदर्शन की मुहताज नहीं होती | झुकी हुई नज़र ,एक मूक दृष्टि,

अश्रुपूरित नयन,काँपते ओंठ या फिर एक हलकी सी मुस्कान बहुत कुछ कह देतीं हैं |

यह तो उस पवित्र भावना का प्रतिफल है जो चाह कर भी नहीं उपजाया जा सकता |

किसी  से  चंद  पलों  की  मुलाकात  या  किसी के कहे दो एक शब्द ही उसके प्रति

अपनत्व  की  भावना  का  सृजन  करने  के  लिए  बहुत होतें हैं | या फिर यह भी

आवश्यक नहीं कि किसी के प्रति आत्मीयता की पृष्ठभूमि में कोई कारण छिपा बैठा हो |

एकांत के अत्यंत ही निजी परिवेश में जब कोई मनुष्य इस पर विचार करता है

तो अनेक बार उसे इसके पीछे कोई कारण समझ में नहीं आता  |सच्चे अर्थों में

आत्मीयता  उसी  को  माना  जा  सकता  है  जिसके  पीछे  कोई कारण न हो |

इसमें कोई संदेह नहीं कि वह  मनुष्य  अत्यंत  सौभाग्यशाली  है   जिसे किसी

का अपनत्व सही मायनों में मिला है |

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