उत्सर्ग

उत्सर्ग का आनंद अतुलनीय होता है | कभी- कभी  कुछ भ्रमित मूल्यों

के रक्षार्थ कुछ प्रतिस्थापित गौरवमयी  क्षणों का मोह त्यागना किसी

के हित के लिए नितांत ही आवश्यक और श्रेयष्कर सा  प्रतीत  होता है |

निर्विवाद रूप से  यह परिस्थिति एक घुटन,एक पीड़ा को जन्म देती है ,

परन्तु इस घुटन  में भी एक सुखद मोक्ष की अपेक्षा और इस पीड़ा में भी

अपने  सृजित को सराहने की आकांक्षा होती है  |

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