बेटिओं की आबरू को तार तार कर रहे
इंसानियत को सरेआम शर्मसार कर रहे 
कौरवों की भीड़ है द्रौपदी हताश है
प्रतिध्वनित हो रहा क्रूर अट्टाहास है
संस्कृति अचेत हो रही संस्कार सो गया
पूरब का तेज पुंज आज किधर खो गया
लज्जा का चीरहरण कैसे रोक पाओगे
कब सुनोगे आर्तनाद कब तक तड़पाओगे
मत लजाओ दूध को ,संभालो तुम आज को
मिटकर भी रखना तुम राखी की लाज को ……….
कल 02/08/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
बहुत उत्कृष्ट और सार्थक भाव लिए अभिव्यक्ति..
बहुत सुन्दर सन्देश परक रचना बधाई आपको