अपना गम ख़ामोश था और दर्द भी था थम गया
फिर भी जाने क्यों जमाने की नज़र हम पर रही
दिल की बातों को हमेशा राज़ ही रहने दिया
फिर हवाओं को आज बेचैनी ये कैसी हो रही
मेरी चाहतों को अब भी किसी का इंतज़ार है
क्या हुआ जो हर कदम पर ठोकर हमें लगती रही
एक अरसे बाद लम्हे फिर से कुछ कहने लगे
क्या पता इतने दिनों तक चुप सी क्यों लगी रही
राज़ अपने दिल में रखिये किसी पर मत खोलिए
क्या कहें ‘दिव्यांश’ दिल में पीड़ क्या उठती रही …..