मनुज तुम महान हो

 

अजेय विज्ञ प्रग्य हो

समर्थ हो समग्र होप्रणेता

उदात्त दत्त चित्त हो

सुकर्म में प्रवृत्त हो

आस्था अगम्य हो

प्रेरणा अदम्य हो

अस्मिता अमूल्य हो

समष्टि स्वर्गतुल्य हो

स्वयं सिद्ध प्राण हो

उर्ध्वमुखी ज्ञान हो

मोह तृण समान हो

दिव्यता का भान हो

मनुज तुम महान हो

मनुज तुम महान हो …………….

चलो चलें उस ठौर

 

चलो चलें उस ठौर जहाँ पर न हो कोई कोलाहलचिंतन

शांत सतह के नीचे न पलती हो कोई भी हलचल

नयनाभिराम सौन्दर्य लाभ को न हो दृष्टि लालायित

क्षुधा तुष्टि का ध्येय लिये दिशाहीन भटके विचलित

अंतरतम की अकुलाहट को सुने ,गुने कुछ ध्यान धरे

हीरे मोती माणिक पत्थर किस छाजन पर गौर करे

पल पंक्षी यूँ उड़ा जा रहा ,होता जाता है ओझल

कर ले पूरी बात समय से चपल चित्त मत हो चंचल

चलो चलें उस ठौर जहाँ पर न हो कोई कोलाहल……

रस्म

 

राष्ट्र पर्व का रस्म निभा लेंगणतंत्र

गए दिनों को याद करें

दिशाहीन द्विग्भ्रमित व्यवस्था

जन किससे फरियाद करे

गण का गणित है बिगड़ गया

अब सूत्रों को क्या याद करें  

मन उचाट है उदासीन

है बैठा सर पर हाथ धरे

सेवक बैठा हुक्म चलाये

आओ हम तुम घड़ा भरें

संविधान मृतप्राय पड़ा है

मौन दृष्टि है नयन झरे  

राष्ट्र पर्व का रस्म निभा लें

गए दिनों को याद करें ………..

 

बादल

 

वक्त की कारीगरी केDSCN0870

हम सदा कायल रहे

कभी गरजे कभी बरसे

भटकते बादल रहे

नीर भर कर भी चले हम

हवाओं से हम लड़े

जब भी मौक़ा हाथ आया

नदी नाले सब भरे

कौन रोया कौन गाया

किसने दी हमको दुआ

कभी सूरज को छुपाया

कभी शिखरों को छुआ

त्रासदी का दंश भोगा

दिल से हम घायल रहे

वक्त की कारीगरी के

हम सदा कायल रहे …….

  

अवलोकन

आकलन

समय या संदर्भों ने न्याय किया या अन्याय यह तो हमारी विचारधारा की परिपक्वता और विगत के अनुभवों

के विश्लेषण पर निर्भर करता है | प्रेम के प्रसंग में किसी की सोच इस प्रस्फुटन को पूर्णकालिक मान लेती है तो

किसी और की सोच में यह  अंशकालिक ही रह जाता है | कुछ के लिये यह अहसास सार्वभौमिक और नैसर्गिक

है तो कुछ को इसमें सिवा स्वार्थ एवं  मनोविकार के सिवा  कुछ और दृष्टिगत  नहीं  होता | जीवन  यात्रा में

अनेक व्यक्तित्वों से  साक्षात्कार  होता  है | कुछ  आपके  बिखराव  को  समेट   एक  सार्थक  स्वरुप  देने  का  

प्रयास करते हैं तो कुछ आपकी अस्मिता को खंडित करने का |

जीवन  के उत्तरार्द्ध  में विगत  का  अवलोकन  करने  के  क्रम  में  यह  निर्णय  पूर्णरूपेण  उस  व्यक्तित्व पर

निर्भर करता है कि किसने  उसकी  वैयक्तिकता  को  संपूर्णता  प्रदान की ,वह  जिसने  उसे सराहा अथवा

वह जिसने उसे आहत  किया | न्याय या  अन्याय ,धर्म  या  अधर्म ,नैतिकता  वा  अनैतिकता ,पाप  अथवा  

पुण्य ,सफलता  या असफलता ,मर्यादित अथवा अमर्यादित ,ये  सभी विषय प्रासंगिक  और  सापेक्ष  हैं |

इन्हें  सार्वभौमिकता  और  सार्वकालिकता की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता | तात्कालिक  सामाजिक  

एवं  सांस्कृतिक अवधारणाओं  के परिप्रेक्ष्य  में  अवलोकन कर के ही हम अपनी सोच को  एक  सार्थक  एवं  

रचनात्मक  ऊर्जा  से  अनुप्राणित  कर  सकते  हैं |   

मूरत

 

मूरत एक अनूठी   

यह कहलाती है

चंचल चपल प्रवाह  मूरत

बाँटती जाती है  

कुल से छूटा साथ

कूल का पता नहीं

खुले व्योम के द्वार

पखेरू उड़ा नहीं

करतल से झरती है

अविरत स्नेह सुधा

पुष्टि तुष्टि करती

स्व की गौण क्षुधा

मंगल ममता प्रेम

निस्वार्थ समर्पण है  

सुत हित में

निज देह नेह का अर्पण है

नहीं उऋण हो सकता

कोई ज्ञानी है

मातृ समर्पित शीश

श्रेष्ठतम प्राणी है !!!!!

अल्हड़ मस्त फकीरा मन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन

 

अल्हड़ मस्त फकीरा मन

अपनी धुन में रमा हुआ

क्या खर्चा क्या जमा हुआ

बाँट रहा बस अपनापन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

 आनी जानी लगी हुई

ठिठकी साँसें ठगी हुई

माया ममता का बंधन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

लगी हुई एक भागमभाग

धुआँ है पसरा नहीं है आग

धन दौलत तृष्णा यौवन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

 घटता जाता है तिल तिल

अब भी ओझल है मंजिल

साज श्रृंगार  रहे बन ठन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

जब कोई गीत

 

जब कोई गीत गुनगुनाता हूँ जब कोई गीत

किसी को आसपास पाता हूँ

थके-हारे उनींदे से पलों को

मीठी सी छुअन से गुदगुदाता हूँ

स्वरों में खोजता हूँ कुछ अनकही बातें

सुरों में बसी हुई सुगंध कोई

लय की गूंज में डूब कर के

बुझ गए दीप कुछ जलाता हूँ

कोई मुखड़ा उभर के बार बार आता है

कई पलों को छेड़ता ,सहलाता है

उसी अहसास को फिर से जी सकूं शायद

यही सोच कर अंतरा दोहराता हूँ

जब कोई गीत गुनगुनाता हूँ …..

 

कभी तो होगी भोर

 

सुलग रहीं आशाएं  ,अरमां दरक रहे

बिना पिये  ही लोग आजकल बहक रहे

मन में भरा गुबार ,घड़ा भर आया है

जली हुई है आग अंधेरा छाया है

कौन सुने फरियाद बहाए आँसू कौन

कोलाहल बाहर पसरा है ,अंदर मौन

नहीं सूझती राह कोई, मन भरमाया

सूख चुके हैं अश्रु नहीं कोई सरमाया

देवालय में बंद प्रभु भी पस्त हुए

चला रहे दुकान सब अपनी मस्त हुए

रखो कदम संभाल मरीचिका मृगनयनी

कैसी भी कर लो करनी पर है भरनी

रवि हुए असहाय ,असमय ग्रसित हुए

देख रहे व्यापार नयन द्विग्भ्रमित हुए

नहीं रहा वो चाँद खोजता जिसे चकोर

कट जायेगी रात कभी तो होगी भोर ……